DEVDAS PART (1) देवदास पार्ट (1)

 मास्टर (गोविन्द पंडित) — (दरवाज़ा ज़ोर से खटखटाने की आवाज़, घबराई हुई आवाज़) मुखर्जी बाबू… मुखर्जी बाबू! ज़रा दरवाज़ा खोलिए, बहुत ज़रूरी बात है!

मुखर्जी बाबू (देवदास के पिता, चिढ़कर) — क्या बात है गोविन्द पंडित? दोपहर की इस गर्मी में तुम यहाँ क्या कर रहे हो?

मास्टर (परेशान होकर) — अरे, मत पूछिए बाबू! आपके बेटे देवदास ने तो मुझे तंग करके रख दिया है। आज पाठशाला में उसने जो किया… मेरा दिल टूट गया। मेरी मेहनत से सँभाली हुई चूने की ढेरी उसने बरबाद कर दी। और बेचारा मेरा शिष्य विश्वनाथ, उसे भी उस ढेरी में धक्का दे दिया।

मुखर्जी बाबू (क्रोध में) — बस! अब और नहीं। यह लड़का दिन-ब-दिन हाथ से निकलता जा रहा है। अभी कहाँ है वह?

पंडित (निराश स्वर में) — पाठशाला से तो भाग गया था… उसके बाद कहाँ गया, कौन जाने।

मुखर्जी बाबू (दाँत भींच कर) — समझ गया। तुम अब जाओ… घर लौटेगा तो मैं ख़ुद देख लूँगा।


☀️ वैशाख की गर्मी भरी दोपहर थी। गोविन्द पंडित की पाठशाला में सब कुछ चल रहा था। बच्चों में एक था शैतान देवदास और दूसरी थी मासूम पार्वती। देवदास की शरारत से टोली में हंगामा मच गया और वह भाग गया।

गोविन्द पंडित ने नारायण मुखर्जी के पास शिकायत की और क़सम खाई कि चाहे नारायण मुखर्जी ज़मींदार हों, लेकिन वह उनके बेटे देवदास को अब कभी नहीं पढ़ाएँगे।

पार्वती ने यह बात सुनी तो उसका दिल उदास हो गया। उसने मन ही मन सोचा — “तो क्या देव दादा अब सच में कभी पाठशाला नहीं आएगा?”

पाठशाला ख़त्म होते ही वह चुपके से देवदास को ढूँढने निकल पड़ी।

पार्वती के पिता नीलकंठ चक्रवर्ती, नारायण मुखर्जी के बड़े घर के पास रहते थे। उनका घर छोटा था, ईंट से बना हुआ। कुछ बीघा ज़मीन थी, जिसमें उनका गुज़र-बसर ठीक से हो जाता था।

रास्ते में पार्वती की मुलाक़ात धर्मदास से हुई, जो देवदास का नौकर था। उसने कहा — “देवदास घर नहीं आया है।” यह सुनकर पार्वती उदास हो गई और चुपचाप अपने घर लौट गई।

घर जाकर उसने देखा कि उसकी माँ और देवदास की माँ को पाठशाला की पूरी बात पहले ही पता चल चुकी थी। दोनों ने पार्वती से भी पूछा। पार्वती ने मुस्कान के साथ थोड़ा गंभीर होकर जवाब दिया, पर अंदर से उसका दिल रो रहा था।

फिर पार्वती ने चुपके से अपनी साड़ी के आँचल में मूरी बाँधी और ज़मींदार के आम के बाग़ में घुस गई। बाग़ के पिछले हिस्से में बाँस का झुरमुट था। पार्वती जानती थी — देवदास अक्सर वहीं जाता है, छिपकर तम्बाकू पीने।

बाँस के झुरमुट में घुसकर उसने देखा — देवदास एक बाँस के पेड़ से टिककर तम्बाकू पी रहा था। उसके चेहरे पर गंभीरता और चिंता के निशान साफ़ दिख रहे थे।

पार्वती को देखकर देवदास के दिल में ख़ुशी हुई, पर उसने अपने चेहरे पर ज़ाहिर नहीं किया। तम्बाकू खींचते हुए उसने ठंडी आवाज़ में कहा — “आ, बैठ जा।”

पार्वती पास आकर बैठ गई। उसके आँचल में जो बँधा था, उस पर देवदास की नज़र गई। उसने खुद ही खोल लिया और खाना शुरू कर दिया। फिर पूछा —

देवदास — “तो पारु… पंडित ने क्या बोला?”

पार्वती (उदासी भरी आवाज़ में) — पंडित ने सब जेठामशाय को बता दिया।

देवदास (चौंककर) — बाबूजी को बता दिया? 😧

पार्वती — हाँ! और कहा है कि तुम्हें अब दोबारा पाठशाला में घुसने नहीं देंगे, ना ही पढ़ाएँगे।

देवदास (अहंकार से, थोड़ा नाराज़ होकर) — मैं पढ़ना भी नहीं चाहता! पानी दे?

पार्वती — पानी कहाँ से लाऊँ?

देवदास (नखरे से) — ओह! सिर्फ मूरी ही लाई है? चल, पानी ले आ।

(देवदास के ऐसे व्यवहार से पार्वती का दिल चोट खा गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए, पर उसने छिपा लिया।)

पार्वती (नाराज़गी के साथ, पर प्यार से) — नहीं… मैं नहीं ला सकती। तुम ख़ुद ही खा लो और आ जाओ।




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