तुम, मैं और मुंबई (part_3 )Tum main our mumbai


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जब प्यार गहरा होता है, तभी हकीकत आकर ज़ोर का झटका देती है। मुंबई हर दिन नए सपने दिखाती है, लेकिन उन सपनों के पीछे कितने रिश्ते खो जाते हैं—इसका हिसाब कौन रखता है?

अब अभिर और राधिका भी उसी बेचैनी का सामना करने वाले हैं।

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एक दिन राधिका को एक मशहूर प्रोड्यूसर ने बुलाया। एक नए नाटक में लीड रोल का ऑफर मिला। मुंबई के बड़े-बड़े मैगज़ीन में उसका नाम छपेगा, रेडियो पर उसका इंटरव्यू चलेगा—ये एक नई ऊँचाई थी।

👧 राधिका (उत्साहित होकर, अभिर से):
"सोच सकते हो अभिर? जिस सपना को हम इतने सालों से देख रहे थे, आज वो मेरे हाथ में है!"

👦 अभिर (आश्चर्य के साथ, लेकिन मन में चिंता):
"बिलकुल, ये तुम्हारा हक है। मुझे पता था कि एक दिन तुम बहुत आगे जाओगी।"

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शब्द तो निकल गए, लेकिन भीतर ही भीतर अभिर को एक अजीब सा डर महसूस होने लगा। मुंबई की चकाचौंध भरी दुनिया में वो कितना छोटा है, कितना असहाय—ये अहसास उसे भीतर से तोड़ने लगा।

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दिन बीतने लगे। राधिका का दिन शुरू होता रिहर्सल से, और खत्म होता मीटिंग्स, शोज़ और इंटरव्यूज़ में। अभिर थक कर ऑफिस से लौटता, लेकिन वो मुस्कान जो कभी उसका इंतज़ार करती थी, अब बिज़ी शेड्यूल के पीछे छिप जाती।

एक शाम अभिर राधिका के फ्लैट पर गया। अंदर रौशनी थी, चारों तरफ लोग—फोटोग्राफर, थियेटर ग्रुप, नए चेहरे। राधिका सबके बीच एक चमकते सितारे की तरह लग रही थी।

👦 अभिर (मन में):
"क्या ये वही राधिका है? जो एक दिन समंदर के किनारे बस मेरा हाथ थामे बैठी थी?"

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रात ढलते लोग चले गए। राधिका थकी हुई थी, लेकिन उसके चेहरे पर खुशी थी। उसने अभिर की ओर देखा।

👧 राधिका (मुस्कुराते हुए):
"आज कैसा लगा? मेरी सक्सेस देखकर खुश हुए?"

👦 अभिर (झिझकते हुए, नजरें झुकाकर):
"खुश तो हूँ… लेकिन कभी-कभी सोचता हूँ, तुम्हारे इस नए वक़्त में मैं कहां हूँ?"

👧 राधिका (चौंककर):
"क्या मतलब?"

👦 अभिर (दर्द के साथ):
"मतलब… अब तुम सबको वक़्त देती हो, लेकिन मैं? क्या मैं धीरे-धीरे खो रहा हूँ?"

👧 राधिका (गुस्से में, आवाज़ ऊँची):
"अभिर! क्या तुम समझते नहीं मैं कितनी मेहनत कर रही हूँ? तुम्हें लगता है मैं बस तुम्हारे पास बैठी रहूं? मेरे भी तो कुछ सपने हैं!"

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अभिर स्तब्ध रह गया। राधिका की आंखों में जो आग थी, वो नई थी। उस रात वो चुपचाप लौट गया, सीने में एक अनजाना खालीपन लेकर।

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कुछ दिन दोनों के बीच खामोशी छा गई। फोन पर बात कम हो गई। जब मिलते, चेहरे पर मुस्कान होती, लेकिन उसके पीछे एक चुपचाप गुस्सा छिपा रहता।

एक दिन मरीन ड्राइव पर दोनों फिर मिले।

👦 अभिर (बेचैनी के साथ):
"राधिका, मुझे पता है तुम बहुत आगे जाओगी, और मैं यही चाहता हूँ। लेकिन सच बताओ, क्या इस सक्सेस की भीड़ में मैं कहीं खो तो नहीं गया?"

👧 राधिका (आँखें नम):
"अभिर, मैं तुम्हें कैसे खो सकती हूँ? तुम तो मेरे सपनों में भी हो।"

👦 अभिर (धीरे से):
"लेकिन कभी-कभी लगता है… जैसे तुम्हारा प्यार अब थोड़ा कम हो गया है।"

👧 राधिका (गुस्से में):
"क्या प्यार को तौला जा सकता है, अभिर? अगर मेरी मेहनत तुम्हें बोझ लगती है, तो… तो शायद हमारे रास्ते अब अलग हैं।"

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"रास्ते अलग"—इन दो शब्दों ने अभिर की दुनिया तोड़ दी।

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इसके बाद अभिर बदलने लगा। ऑफिस से लौटकर अकेला बैठा रहता। धीरे-धीरे दोस्त भी दूर हो गए। कभी-कभी रात के अंधेरे में शराब की बोतल लेकर समंदर के पास खड़ा रहता।

👦 अभिर (नशे में, खुद से):
"राधिका… तुमने कभी समझा ही नहीं। मुझे रौशनी नहीं चाहिए थी, बस तुम्हारा साथ चाहिए था।"

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लेकिन इस शहर की भीड़ किसी का दर्द नहीं सुनती। राधिका भी अपनी व्यस्तता में डूबी जा रही थी। कभी-कभी फोन करती, लेकिन अभिर जवाब नहीं देता। प्यार था, लेकिन उसी में अंधेरा भी भरने लगा था।

🎙️  (Part 3 का अंत):

जितना गहरा प्यार होता है, उतनी ही गहरी चोट लगती है। अभिर और राधिका का रिश्ता अब एक मुश्किल मोड़ पर खड़ा था। आगे क्या होगा—प्यार बचेगा या टूट जाएगा पूरी तरह—ये फैसला अब किस्मत के हाथ में था।

Last part __ 
https://firsekahanisuno.blogspot.com/2025/09/last-part-tum-mai-our-mumbai.html

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